सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि भारत की सनातन चेतना, अडिग आस्था और सांस्कृतिक आत्मा का जीवंत प्रतीक है: स्वामी चिदानन्द सरस्वती

ऋषिकेश । वर्ष 2026 में आस्था की हमारी तीर्थस्थली सोमनाथ ज्योतिर्लिंग पर हुए पहले आक्रमण के 1000 वर्ष पूरे हो रहे हैं। बार-बार हुए हमलों के बावजूद हमारा सोमनाथ मंदिर आज भी अडिग खड़ा है! सोमनाथ दरअसल भारत माता की उन करोड़ों वीर संतानों के स्वाभिमान और अदम्य साहस की गाथा है, जिनके लिए अपनी संस्कृति और सभ्यता सदैव सर्वाेपरि रही है।
माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के ट्वीट पर पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने उन्हें धन्यवाद देते हुये कहा कि सोमनाथ- 1026 से 2026 तक आस्था, इतिहास और विजय की अमर गाथा है।

सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि भारत की सनातन चेतना, अडिग आस्था और सांस्कृतिक आत्मा का जीवंत प्रतीक है। अरब सागर के तट पर स्थित यह प्रथम ज्योतिर्लिंग हजार वर्षों से अधिक समय से मानव इतिहास को यह सिखा रहा है कि विनाश क्षणिक होता है, पर सत्य और श्रद्धा शाश्वत।

1026 ईस्वी में महमूद ग़ज़नवी ने सोमनाथ पर आक्रमण किया। मंदिर को लूटा गया, मूर्तियाँ खंडित की गईं, यह एक ऐतिहासिक सत्य है और इससे मुँह नहीं मोड़ा जा सकता। परंतु यदि इतिहास को यहीं समाप्त मान लिया जाए, तो यह अधूरा सत्य होगा। क्योंकि उसी क्षण से सोमनाथ की एक नई यात्रा प्रारंभ हुई पुनर्निर्माण, पुनर्जागरण और आत्मगौरव की यात्रा।

आक्रमण के बाद भी भारतीय समाज ने हार नहीं मानी। विभिन्न कालखंडों में गुजरात के हिंदू शासकों ने मंदिर के पुनर्निर्माण का कार्य किया। 18वीं शताब्दी में पुण्यश्लोक रानी अहिल्याबाई होलकर ने शिवलिंग की पुनः स्थापना कर यह स्पष्ट कर दिया कि सत्ता बदल सकती है, पर आस्था नहीं। यह कार्य केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक प्रतिरोध का प्रतीक था।

स्वतंत्रता के बाद, 1947 में, सोमनाथ का पुनर्निर्माण भारत के राष्ट्रीय आत्मसम्मान का प्रश्न बन गया। सरदार वल्लभभाई पटेल ने इस मंदिर को पुनः खड़ा करने का संकल्प लिया। 1951 में भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद द्वारा प्राण-प्रतिष्ठा की गई। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि गुलामी के युग से बाहर निकलकर आत्मगौरव की पुनर्स्थापना का उद्घोष था।

21वीं शताब्दी में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में, सोमनाथ का व्यापक विकास हुआ। मंदिर परिसर का विस्तार, तीर्थ सुविधाएँ, डिजिटल मार्गदर्शन और सांस्कृतिक पुनर्जागरण यह सब दर्शाता है कि भारत अपनी जड़ों से जुड़कर भविष्य की ओर बढ़ रहा है।

1026 से 2026 तक की यह हज़ार वर्षों की यात्रा सिद्ध करती है कि सोमनाथ का इतिहास विनाश की कहानी नहीं, बल्कि विजय की गौरवगाथा है। तलवारों से मंदिर टूट सकते हैं, पर आस्था नहीं। साम्राज्य मिट सकते हैं, पर संस्कृति नहीं। आज भी सोमनाथ अडिग खड़ा है, मानवता को यह संदेश देते हुए कि जो सत्य पर आधारित होता है, वह समय, सत्ता और आक्रमणों से परे अमर रहता है।

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