संगम तट, परमार्थ न्यू अरैल घाट की दिव्य व भव्य गंगा आरती में उड़ीसा के माननीय मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी एवं धर्मपत्नी डॉ. प्रियंका मार्डन की गरिमामयी उपस्थिति

संगम के तट से दिलों का संगम हो, दलों का संगम हो: स्वामी चिदानन्द सरस्वती

प्रयागराज। परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने संगम तट पर आयोजित भव्य दिव्य गंगा आरती से संगम का संदेश देते हुये कहा संगम के तट से दिलों का संगम हो, दलों का संगम हो। संगम के तट से संगम का संदेश लेकर जायें।
संगम तट, परमार्थ न्यू अरैल घाट, प्रयागराज की दिव्य व भव्य गंगा आरती में आज उड़ीसा के माननीय मुख्यमंत्री श्री मोहन चरण माझी जी एवं धर्मपत्नी डॉ. प्रियंका मार्डन जी की गरिमामयी उपस्थिति रही। उड़ीसा के माननीय एडवोकेट जनरल आदरणीय श्री पीताम्बर आचार्य जी, उत्तरप्रदेश सरकार के जल शक्ति विभाग के कैबिनेट मंत्री श्री स्वतंत्र देव सिंह जी, भारत चैतन्य युवाजन पार्टी के अध्यक्ष एवं संस्थापक श्री रामचंद्र यादव जी और अनेक विशिष्ट अतिथियों का पावन सान्निध्य प्राप्त हुआ।
माननीय मुख्यमंत्री श्री मोहन चरण माझी जी ने कहा कि महाकुम्भ के पावन अवसर पर फरवरी 23, 2025 को प्रयागराज आये थें आज फिर से यहां आने का अवसर प्राप्त हुआ। मां गंगा जी के चरणों में कोटि-कोटि नमन।


श्री जगन्नाथ जी का प्रसाद तब तक महाप्रसाद नहीं बनता जब मां विमला देवी जी को भोग नहीं लगता इस प्रकार भगवान जगन्नाथ जी नारी सशक्तिकरण का संदेश देते है। जगन्नाथ जी हमारे घर के सदस्य की तरह हैं।
आज का यह पावन दिवस हम सभी के जीवन में एक दिव्य अध्याय जोड़ रहा है। परमार्थ त्रिवेणी पुष्प, परमार्थ निकेतन व पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज की एक अद्भुत पहल है जहां से देवभक्ति व देशभक्ति का संदेश एक साथ संगम की त्रिवेणी की तरह प्रवाहित हो रहा है।


आज यहां भगवान जगन्नाथ जी के भव्य मंदिर का उद्घाटन हो रहा है, हम सभी इसके साक्षी है। यह एक स्थापत्य का शुभारंभ नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और आत्मिक चेतना के पुनर्जागरण का महोत्सव है। यह क्षण मेरे लिए अत्यंत भावुक करने वाला गौरवपूर्ण अवसर है।
भगवान जगन्नाथ जी हमारे ओडिशा की पहचान है, हमारा मान है और साथ ही  वे संपूर्ण भारत की आत्मा भी हैं। उनकी रथयात्रा हमें संदेश देती है कि ईश्वर स्वयं भक्तों के द्वार आते हैं, भेदभाव मिटाते हैं और सबको अपने प्रेम में समाहित करते हैं। आज संगम की इस पावन भूमि पर उनका मंदिर स्थापित होना उत्तर और पूर्व भारत की सांस्कृतिक एकता का जीवंत सेतु है।
यह पावन मंदिर ओडिशा की भक्तिभाव से भरी श्रीजगन्नाथ परंपरा और त्रिवेणी संगम की तप, त्याग और साधना से ओतप्रोत चेतना के बीच एक अद्भुत आध्यात्मिक सेतु है।
पूज्य स्वामीजी के विजन और परमार्थ निकेतन परिवार के तप, त्याग और प्रेम से यह स्वप्न साकार हुआ। मुझे पूर्ण विश्वास है यह मंदिर मानवता, सद्भाव और आध्यात्मिक जागरण का प्रकाशस्तंभ बन कर उभरेगा।
इस अवसर पर उन्होंने उड़ीसा में होने वाले दिव्य व भव्य विकास कार्यों का उल्लेख करते हुये सभी को आमंत्रित पुरी आने हेतु आमंत्रित किया।
प्रयागराज से उड़ीसा का सम्बंध अन्नय है, अटूट है, एक उड़िया की दो ही इच्छायें होती हैं एक जगन्नाथ जी के अधिक से अधिक दर्शन करें और दूसरा संगम प्रयाग में समाहित हो यह मन्दिर इस संगम को खड़ा कर रहा है।
इस पावन अवसर पर श्री विनोद बागरोडिया जी, ए.पी. श्री सिंगला जी, श्री वेदा स्वामी जी, स्वामी ईश्वरदास जी, स्वामी शुक्रायनाथ जी, श्री दिनेश शाहरा जी, श्री अरुण सारस्वत जी, श्री जगदीश परमार्थी जी सहित अनेक विशिष्ट व्यक्तित्व, देशविदेश से आये विशिष्ट अतिथिगण और पूज्य संतों का पावन सान्निध्य प्राप्त हुआ।
स्थानीय लोगों ने कहा कि पूज्य स्वामी जी के मार्गदर्शन में पूरे त्रिवेणी पुष्प क्षेत्र का अद्भुत कायाकल्प हुआ है। इस पूरे क्षेत्र की तस्वीर भी बदली और अब तकदीर भी बदल रही है।

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