लिथुआनिया में गूंजा भारतीय ज्ञान-संदेश, देवसंस्कृति विश्वविद्यालय ने फहराया वैश्विक परचम

हरिद्वार। देव संस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति युवा आइकन डॉ. चिन्मय पण्ड्या ने अपने यूरोप प्रवास के दौरान लिथुआनिया के प्रमुख शैक्षणिक केंद्रों में पहुँचकर भारतीय ज्ञान परंपरा का प्रभावी प्रसार किया। इस प्रवास के दौरान वहाँ के युवाओं और शोधार्थियों में भारतीय संस्कृति के प्रति अभूतपूर्व उत्साह देखने को मिला।
डॉ. पण्ड्या ने लिथुआनिया में अध्ययनरत मास्टर एवं पीएचडी के विद्यार्थियों का विभिन्न विषयों पर मार्गदर्शन किया। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि उन्नत, संतुलित और उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने की कला है। उन्होंने समग्र शिक्षा, नैतिक मूल्यों और वैज्ञानिक अध्यात्म के समन्वय पर प्रकाश डालते हुए बताया कि प्राचीन भारतीय सिद्धांतों में आज की वैश्विक समस्याओं के समाधान निहित हैं। उन्होंने युवाओं को इन सिद्धांतों को जानने, समझने और जीवन में अपनाने का आह्वान किया।
लिथुआनिया के प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में आयोजित संवादात्मक कक्षाओं में विदेशी विद्यार्थियों ने गहरी रुचि दिखाई। शोधार्थियों ने भारतीय जीवन-दर्शन, योग एवं ध्यान को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने के प्रति विशेष उत्साह व्यक्त किया। डॉ. पण्ड्या ने विद्यार्थियों को प्रेरित करते हुए कहा कि केवल भौतिक प्रगति ही जीवन का लक्ष्य नहीं हो सकती; आंतरिक शांति, नैतिक शक्ति और मानवीय संवेदनाएँ भी उतनी ही आवश्यक हैं।
यह प्रवास केवल शैक्षणिक आदान-प्रदान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय शिक्षा जगत में देव संस्कृति विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने वाला सिद्ध हुआ। हरिद्वार की तपोभूमि से निकली ऋषि चिंतन की धारा आज यूरोप के शैक्षणिक केंद्रों में भी युवाओं का मार्गदर्शन कर रही है।

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