- थाईलैंड,राजदूत, एच.ई. चवनार्ट थांगसुम्फांत, इजराइल, मानद वाणिज्यदूत, सुश्री जॉयश्री वर्मा, गुयाना, उच्चायुक्त, एच.ई. श्री धरमकुमार सीराज, सर्बिया, राजदूत, एच.ई. सिनिशा पाविक, नेपाल, प्रभारी राजदूत (चार्ज डी अफेयर्स), एच.ई. डॉ. सुरेन्द्र थापा, बांग्लादेश, उच्चायुक्त, एच.ई. एम. रियाज हमीदुल्लाह, वियतनाम, प्रथम सचिव, सुश्री होआंग थी येन, फिलीपींस, द्वितीय सचिव, सुश्री मेलिसा ऐन टेलन, पनामा, कौंसल, सुश्री एडिजा जिमेनेजय त्रिनिदाद एवं टोबैगो, प्रशासनिक अटैची, सुश्री चार्लीन रामसुंदर, जॉर्जिया, उप मिशन प्रमुख, श्री बर्दिया बेकाउरी, लिथुआनिया, उप मिशन प्रमुख, श्री लुकास किसिएलियू, मालदीव, सचिव, सुश्री राशु काशिफ, पलाऊ, मानद वाणिज्यदूत, श्री नीरज ए. शर्मा, गैबॉन, प्रभारी राजदूत, एच.ई. श्री फ्रांसिस जुएम्बा, कांगो (ब्राजाविल), प्रथम सचिव, श्री सिरियाक गनवाला, इक्वेटोरियल गिनी, काउंसलर, श्री लियोनार्डो मोला लाप्लाटा मुमय बोत्सवाना, सचिव, सुश्री प्रियंका साहनी, रूस, सांस्कृतिक काउंसलर, सुश्री अनास्तासिया इल्युशिनाय श्रीलंका, मंत्री (काउंसलर), सुश्री निरोशा के. हेराथ की गरिमामयी उपस्थिति
- 12वें अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस की पूर्व संध्या पर विश्व के अनेक देशों के राजदूतों, राजनायिकों और उच्चायुक्तों ने परमार्थ निकेतन की विश्वविख्यात गंगा आरती में किया सहभाग
- योग की शक्ति ही शान्ति और वैश्विक एकता का द्वार
- परमार्थ गंगा तट से गूंजा वसुधैव कुटुम्बकम् का वैश्विक संदेश

ऋषिकेश। 12वें अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस की पूर्व संध्या पर विश्व के अनेक देशों से आये राजदूतों, राजनायिकों एवं उच्चायुक्तों ने परमार्थ निकेतन में आयोजित विश्वविख्यात गंगा आरती में सहभाग कर भारत की आध्यात्मिक संस्कृति और योग की सार्वभौमिक चेतना का अनुभव किया। पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी एवं साध्वी भगवती सरस्वती जी के पावन सान्निध्य में आयोजित दिव्य गंगा आरती ने सम्पूर्ण वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा, शान्ति और वैश्विक सद्भाव से आलोकित किया।
परमार्थ निकेतन गंगा तट पर विभिन्न देशों से आये प्रतिनिधियों ने भारत की उस सनातन परम्परा को अनुभव किया जो सम्पूर्ण विश्व एक परिवार है का संदेश देती है। गंगा तट से गूंजता ’वसुधैव कुटुम्बकम् का उद्घोष केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिये जीवन-दर्शन हैै।

इस अवसर पर पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि योग केवल व्यायाम नहीं, बल्कि यह जीवन जीने की कला है। योग व्यक्ति को स्वयं से जोड़ता है, समाज को संस्कारों से जोड़ता है और राष्ट्रों को शान्ति के सूत्र में पिरोता है। आज विश्व को हथियारों की नहीं, योग की आवश्यकता है। युद्ध कभी स्थायी समाधान नहीं देता, परन्तु योग हमारे भीतर प्रेम, करुणा और सह-अस्तित्व की भावना जागृत करता है। जब व्यक्ति स्वयं के भीतर शान्त होगा, तभी परिवार, समाज, राष्ट्र और सम्पूर्ण विश्व में स्थायी शान्ति स्थापित होगी।

उन्होंने कहा कि भारत ने विश्व को संघर्ष नहीं, समन्वय और शान्ति का मार्ग दिखाया है। योग सीमाओं, भाषाओं, संस्कृतियों और विचारधाराओं से ऊपर उठकर सम्पूर्ण मानवता को जोड़ने वाला आध्यात्मिक विज्ञान है। आज आवश्यकता इस बात की है कि योग को हम जीवन की संस्कृति बनाये।

साध्वी भगवती सरस्वती जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि योग हमें यह अनुभव कराता है कि सम्पूर्ण सृष्टि एक है। जब हम योग करते हैं तो हम केवल अपने शरीर से नहीं, बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड से जुड़ते हैं। यही जुड़ाव हमें प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनाता है, मानवता के प्रति करुणामय बनाता है और विश्व शान्ति का आधार तैयार करता है। योग बाहरी उपलब्धियों से अधिक भीतरी परिवर्तन का मार्ग है।
उन्होंने कहा कि आज की पीढ़ी को योग के माध्यम से केवल शारीरिक स्वास्थ्य ही नहीं, बल्कि मानसिक संतुलन, भावनात्मक दृढ़ता, आध्यात्मिक जागरण और पर्यावरणीय उत्तरदायित्व की भी प्रेरणा मिल रही है। योग का प्रत्येक आसन, प्रत्येक श्वास और ध्यान मानवता को एक नई दिशा देने की क्षमता रखता है।
परमार्थ निकेतन गंगा आरती में उपस्थित विभिन्न देशों के राजनायिकों ने भारत की आध्यात्मिक विरासत, मां गंगा की पावनता तथा योग की वैश्विक प्रासंगिकता की मुक्त कंठ से सराहना की। उन्होंने अनुभव किया कि भारत केवल योग का जन्मस्थान ही नहीं, बल्कि विश्व शान्ति और मानवीय मूल्यों का भी आध्यात्मिक केन्द्र भी है।
अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस की यह पूर्व संध्य एक आध्यात्मिक घोषणा है कि यदि विश्व को स्थायी शान्ति चाहिए, यदि मानवता को विभाजन से ऊपर उठकर एकता के पथ पर आगे बढ़ना है, यदि आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित और समरस भविष्य देना है, तो योग को जीवन का आधार बनाना होगा।
आज सम्पूर्ण विश्व यह स्वीकार कर रहा है कि भारत की धरोहर योग सम्पूर्ण मानवता की अमूल्य विरासत है। अन्तर्राष्ट्रीय योग महोत्सव के पश्चात परमार्थ निकेतन के पावन गंगा तट से पुनः यह संदेश सम्पूर्ण विश्व में गुंजायमान हुआ कि योग ही शान्ति है, योग ही एकता है, योग ही मानवता है।
पूज्य स्वामी जी ने सभी अतिथियों को रूद्राक्ष का पौधा भेंट कर उनका अभिनन्दन किया।
