- परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने उन्हें वेद विद्यालयों की स्थापना, विशुद्ध वैदिक स्वर परम्परा के संरक्षण एवं गुरूकुलों में शास्त्रार्थ संस्कृति के पुनर्जागरण हेतु किया प्रेरित

ऋषिकेश। स्वामी वेदविद्यानन्द सरस्वती जी परमार्थ निकेतन आये। उन्होंने परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज से भेंट की। दोनों पूज्य संतों के बीच वेदों के संरक्षण, संवर्धन और नवयुगीन पुनर्जागरण को लेकर व्यापक एवं दूरदर्शी चर्चा हुई। विशेष रूप से वेद विद्यालयों की स्थापना, विशुद्ध वैदिक स्वर, उच्चारण एवं मंत्रोच्चार की प्रामाणिक परम्परा के संरक्षण, तथा गुरूकुलों के विद्यार्थियों को शुद्ध वेद मंत्रों का नियमित अभ्यास एवं प्रशिक्षण प्रदान करने की आवश्यकता पर विचार-विमर्श किया गया।

पूज्य स्वामी जी ने कहा कि वेद, भारत की चेतना, संस्कृति और आध्यात्मिक विज्ञान के जीवंत स्रोत हैं। यदि उनकी मौखिक परम्परा, स्वर-विन्यास, ऋषि-परम्परा और शास्त्रीय अनुशासन सुरक्षित रहेंगे, तभी आने वाली पीढ़ियाँ उनके वास्तविक स्वरूप का अनुभव कर सकेंगी। वेदों का संरक्षण, शुद्ध कण्ठ, अनुशासित साधना और गुरु-शिष्य परम्परा के माध्यम से ही सम्भव है।
पूज्य संतों ने इस बात पर विशेष बल दिया कि वर्तमान समय में जहाँ आधुनिक शिक्षण संस्थानों में डिबेट, शोध और बौद्धिक विमर्श विद्यार्थियों की प्रतिभा को निखारते हैं, वहीं उसी प्रकार गुरूकुलों में भी वेद, उपनिषद, दर्शन, व्याकरण, मीमांसा, न्याय एवं शास्त्रों पर शास्त्रार्थ, वैदिक संवाद, मंत्रोच्चारण प्रतियोगिताएँ तथा श्लोक-पाठ प्रतियोगिताएँ नियमित रूप से आयोजित की जाने की आवश्यकता है।

पूज्य स्वामी जी ने कहा कि भारत की प्राचीन शास्त्रार्थ परम्परा सत्य की खोज का श्रेष्ठतम माध्यम थी। शास्त्रार्थ का उद्देश्य पराजय या विजय नहीं, बल्कि ज्ञान का विस्तार, चिंतन की परिष्कृति और सत्य की प्रतिष्ठा है। आज आवश्यकता है उसी महान परम्परा को आधुनिक संदर्भों में पुनर्जीवित किया जाए, जिससे युवा पीढ़ी वेदों और शास्त्रों को केवल पढ़े ही नहीं, बल्कि उनके गूढ़ अर्थों को समझे, आत्मसात करे और जीवन में उतारे।
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि भारत का भविष्य तकनीकी प्रगति के साथ अपनी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े ज्ञान के पुनर्जागरण से उज्ज्वल होगा। वेद मानवता के लिए शाश्वत प्रकाश हैं। उनमें प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता, मानव जीवन के उच्चतम मूल्य, समरसता, यज्ञभाव, पर्यावरण संरक्षण, आत्मानुशासन और विश्वकल्याण का दिव्य संदेश समाहित है। यदि नई पीढ़ी वेदों से जुड़ेगी तो उनका व्यक्तित्व केवल विद्वान ही नहीं, बल्कि मूल्यवान भी बनेगा।
पूज्य स्वामी वेदविद्यानन्द सरस्वती जी ने कहा कि वैदिक परम्परा को जीवित रखना सम्पूर्ण समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। वेदों का संरक्षण तभी सम्भव होगा जब अधिक से अधिक बालक-बालिकाएँ वैदिक अध्ययन की ओर प्रेरित हों, गुरूकुलों को सशक्त बनाया जाए, योग्य आचार्यों का सम्मान हो तथा वैदिक स्वर परम्परा की शुद्धता को सर्वाेच्च प्राथमिकता दी जाए। उन्होंने कहा कि पूज्य स्वामी जी ने संगम तट प्रयागराज में परमार्थ त्रिवेणी पुष्प और अरैल घाट पर ऋषिकन्याओं द्वारा वेदमंत्रों से गंगा आरती शुरू कर समाज में विलक्षण किया। युवाओं को नई दिशा प्रदान की।
उन्होंने कहा कि समय की आवश्यकता के अनुरूप ऐसे राष्ट्रीय स्तर के आयोजन किए जाएँ, जिनमें विभिन्न गुरूकुलों के विद्यार्थी एक मंच पर आकर वैदिक मंत्रोच्चारण, शास्त्रार्थ, श्लोक-पाठ, वैदिक ज्ञान-विमर्श एवं संस्कृत वाङ्मय पर आधारित प्रतियोगिताओं में सहभागिता करें। ऐसे आयोजन केवल प्रतिभा का सम्मान नहीं करेंगे, बल्कि भारत की ज्ञान परम्परा को नई पीढ़ी के बीच पुनः प्रतिष्ठित करेंगे।
यह चर्चा वैदिक मंत्रों की दिव्य अनुगूँज, गुरु-परम्परा के प्रति श्रद्धा और भारत की ज्ञान-संस्कृति के पुनर्जागरण के संकल्प से ओतप्रोत रही। यदि वेदों की वाणी पुनः जन-जन तक पहुँचेगी, यदि गुरूकुलों में शास्त्रार्थ की परम्परा पुनर्जीवित होगी और यदि युवाओं को अपने सनातन ज्ञान-विज्ञान से जोड़ने का सतत प्रयास होगा, तो भारत पुनः विश्व को ज्ञान, संस्कृति, करुणा और आध्यात्मिक नेतृत्व प्रदान करने में सक्षम होगा।
पूज्य स्वामी जी ने स्वामी वेदविद्यानन्द सरस्वती जी को श्रावण की दिव्य भेंट रूद्राक्ष का पौधा भेंट किया।



