होली का संदेश स्पष्ट है, बुराई का अंत और अच्छाई का शुभारंभ: स्वामी चिदानन्द सरस्वती

  • होली, राष्ट्र चेतना के रंगों का महापर्व
  • परमार्थ निकेतन से आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाएँ
  • रंगों की उमंग, चेतना की तरंग और राष्ट्रभक्ति के संग आइए होली मनायें

ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष, स्वामी शुकदेवानन्द ट्रस्ट के मैनेजिंग ट्रस्टी, स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने देशवासियों को होलिका दहन की शुभकामनायें देते हुये कहा कि होलिका दहन की पावन अग्नि आपके जीवन की सभी नकारात्मकता, भय और दुखों को जलाकर राख कर दे और आपके जीवन में सुख, शांति, प्रेम और नई ऊर्जा का प्रकाश भर दे। माँ गंगा से प्रार्थना है कि आपका हर दिन रंगों की तरह उज्ज्वल और आनंदमय हो।
होली का पर्व सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय चेतना का महायज्ञ है। यह त्योहार हमें संदेेश देता है कि हमारी संस्कृति, परंपराओं के साथ जीवन जीने की दृष्टि में बसती है। विविधताओं से सजे इस राष्ट्र में भाषा, वेशभूषा, खान-पान और परंपराएँ भिन्न हो सकती हैं, एकता ही भारत की असली पहचान है। होली इसी एकता का जीवंत, साक्षात और रंगीन प्रमाण है।
परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि होली का संदेश स्पष्ट है, बुराई का अंत और अच्छाई का शुभारंभ। होलिका दहन एक पौराणिक घटना का स्मरण नहीं, बल्कि हमारे भीतर छिपी नकारात्मकताओं, भय, द्वेष, ईष्र्या, क्रोध और विभाजनकारी विचारों को अग्नि में समर्पित करने का प्रतीक है। आज जब समाज में भ्रम, भेदभाव और नेगेटिव नैरेटिव्स फैलाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, तब होली हमें सकारात्मकता, विश्वास और राष्ट्रनिर्माण का संकल्प लेने का अवसर प्रदान करती है।
यह पर्व हमें संदेश देता है कि रंगों की तरह हमारे जीवन में भी विविधता आवश्यक है। लाल रंग साहस का, पीला ज्ञान का, हरा समृद्धि का, नीला आकाश की असीमता का और गुलाबी प्रेम व करुणा का प्रतीक है। जब ये सभी रंग मिलते हैं, तब एक सुंदर चित्र बनता है। इसी प्रकार जब समाज के सभी वर्ग युवा, नारी शक्ति, किसान, सैनिक, संत, वैज्ञानिक और श्रमिक, सभी वर्ग, सभी जातियाँ और सभी दल एक साथ खड़े होते हैं, तब राष्ट्र शक्तिशाली बनता है।
आज आवश्यकता है कि हम चेतना की होली जलाएँ। सोशल मीडिया और सार्वजनिक जीवन में फैल रहे नकारात्मक विचार, निराशा, आलोचना और विघटन की प्रवृत्तियों को त्यागकर आशा, सहयोग और समाधान की संस्कृति को अपनाएँ। भारत की आत्मा सदैव ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ के मंत्र से प्रेरित रही है। यही हमारी सनातन सोच है, जो दुनिया को जोड़ने का कार्य करती है।
युवा शक्ति इस परिवर्तन की धुरी है। यदि युवा ठान लें कि वे देश के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाएँगे, स्वदेशी का सम्मान करेंगे, पर्यावरण की रक्षा करेंगे, जल संरक्षण, स्वच्छता और सामाजिक समरसता में योगदान देंगे, तो राष्ट्र का भविष्य स्वर्णिम होगा। होली हमें यही प्रेरणा देती है कि हम अपने भीतर की सुप्त ऊर्जा को जागृत करें और राष्ट्र सेवा को जीवन का उद्देश्य बनाएँ।
यह समय है कि हम ‘मैं’ से ‘हम’ की यात्रा करें। परिवारों में प्रेम बढ़ाएँ, समाज में संवाद बढ़ाएँ और राष्ट्र के प्रति कर्तव्यबोध बढ़ाएँ। होली के रंग हमें बताते हैं कि जब हम एक-दूसरे को रंग लगाते हैं, तब सभी भेद मिट जाते हैं, न कोई ऊँच-नीच, न कोई वर्ग-भेद, न कोई दूरी, यही सामाजिक समरसता भारत की सबसे बड़ी शक्ति है।
आइए, इस वर्ष हम एक नई होली मनाएँ, संकल्पों की होली, सेवा की होली, स्वच्छता की होली, सद्भाव की होली और राष्ट्रगौरव की होली हो। अपने घर, मोहल्ले और कार्यस्थल पर सकारात्मक वातावरण बनाएँ। प्राकृतिक रंगों का उपयोग कर पर्यावरण की रक्षा करें। जल का संरक्षण करें। जरूरतमंदों के साथ खुशियाँ बाँटें। सैनिकों, किसानों और श्रमिकों के योगदान को याद करें। यही सच्ची होली है।
होली हमें याद दिलाती है कि अंधकार चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, एक छोटी सी ज्योति उसे समाप्त कर सकती है। हम सभी वह ज्योति बन सकते हैं। जब 140 करोड़ भारतीयों का मन सकारात्मकता से भरेगा, तब भारत केवल एक देश नहीं, बल्कि विश्व का मार्गदर्शक प्रकाश बनेगा।
आइए, होलिका दहन की अग्नि में अपने भीतर की नकारात्मकता को समर्पित करें और रंगों के इस महापर्व को राष्ट्रीय जागरण का पर्व बनाएँ। प्रेम, विश्वास, एकता और समर्पण के रंगों से सशक्त, समृद्ध और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण का संकल्प लें। आज की होली लकड़ियों ने नहीं बल्कि गोबर के उपलों को जलाकर प्रतिकात्मक होली मनाये जिससे संस्कृति भी बचेगी, प्रकृति भी बचेगी और संतति भी बचेगी।

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