नील हरित शैवाल की खेती पर रहेगा अब जोर – त्रिपाठी

गोपेश्वर (चमोली)। हर्बल रिसर्च एंड डेवलपमेंट इंस्टिट्यूट (एचआरडीआई) के निदेशक डा. अभिषेक त्रिपाठी ने कहा कि नील हरित शैवाल (स्पीरूलीना) की खेती को बढ़ावा देकर किसानों की आय में वृद्धि होगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा सुपर फूड का दर्जा मिलने खेती को और भी बढ़ावा मिलेगा। जड़ी बूटी शोध एवं विकास संस्थान मण्डल में एचआरडीआई निदेशक डा. त्रिपाठी की अध्यक्षता में नील-हरित शेवाल एवं जड़ी बूटी को लेकर आयोजित समीक्षा बैठक में उन्होंने कहा कि मनरेगा के तहत विभिन्न औषधीय पौंधों की कृषि हेतु किसानों को 3 नाली भूमि हेतु मुफ्त पौध उपलब्ध करवाए जा रहे हैं।  किसान औषधीय पौंधों की 26 प्रजातियों यथा कुटकी, अतीस, कूठ आदि की खेती कर सकेंगे। उनका कहना था कि मौजूदा समय में 26 हजार से अधिक किसान जड़ी बूटी की खेती को संस्थान के माध्यम से पंजीकृत होने के चलते योजना का लाभ ले रहे हैं। उन्होंने नील-हरित शैवाल की खेती को अच्छा प्रयास बताते हुए कहा कि इसका लाभ आम किसानों तक पहुंचेगा। इससे किसानों की आय में इजाफा होगा।

भारतीय कृषि अनुसंधान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ ओएम तिवारी ने नील-हरित शैवाल की कृषि के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि नील हरित शैवाल एक मात्र शैवाल है जिसको मानव आहार के रूप में प्रयोग कर सकता है। इस शैवाल की  विश्व में कुल 9 प्रजातियां पायी जाती हैं। उन्होंने कहा कि पूर्व में यह अवधारणा थी कि स्पिरुलीना शैवाल केवल समुद्र में पाया जाता है लेकिन लोकटक झील मणिपुर का शोध करने पर पता चला कि यह शैवाल ताजे पानी में भी पायी जाती है। इसके चलते इसकी खेती करने की संभावनाएं उत्पन्न हुयी हैं। उन्होंने बताया कि नील-हरित शैवाल की कृषि से किसानों की आय बढेगी। इस  शैवाल को विश्व स्वास्थ्य संस्थान ने वर्ष 1971 में सुपर फूड का दर्जा भी प्रदान किया है। इसके एक कैप्सूल में 2 लीटर दूध से अधिक ऊर्जा मिलती है।

जड़ी बूटी शोध एवं विकास  संस्थान के वैज्ञानिक एके भंडारी बताया कि जड़ी बूटी शोध संस्थान मण्डल की स्थापना वर्ष 1989 में हुयी थी। संस्थान का  उद्देश्य हिमालय क्षेत्र की सभी जड़ी बूटियों का नाप भूमि में खेती करना रहा है। इससे वन भूमि में हो रही जड़ी बूटियों का विदोहन रोका जा रहा है। वर्ष 2002 में जड़ी बूटियों की खेती करना प्रारम्भ किया गया। इसके चलते राज्य में 26 हजार से अधिक किसान जड़ी बूटी की खेती का लाभ ले रहे हैं। इस दौरान परियोजना निदेशक आनन्द सिंह  एवं संस्थान के अन्य अधिकारी मौजूद रहे।

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