त्रिवेणी संगम की पावन धरा पर संगीत और अध्यात्म का दिव्य महासंगम

  • पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती, आचार्य धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री एवं हंसराज रघुवंशी के सान्निध्य में भक्ति से पुलकित हुआ संगम तट
  • प्रयागराज संगम तट पर संत वाणी और भक्ति संगीत ने जगाई सनातन चेतना की दिव्य ज्योति
  • भक्ति, आनंद, ऊर्जा और अध्यात्म से आलोकित हुआ त्रिवेणी संगम, उमड़ा श्रद्धा का जनसागर

प्रयागराज। भारत की आध्यात्मिक चेतना का ध्रुवतारा, जहां गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का पावन संगम है वह मानवता को एकता का शाश्वत संदेश देता रहा है, उसी पुण्यभूमि त्रिवेणी संगम में एक अद्वितीय और अलौकिक आध्यात्मिक-सांस्कृतिक आयोजन सम्पन्न हुआ। ऐसे अवसर भारतीय संस्कृति, सनातन परंपरा, भक्ति और राष्ट्रीय चेतना के विराट उत्सव के रूप में इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों में अंकित हो जाते हैं।
परम पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज, बागेश्वरपीठाधीश्वर आचार्य धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री जी तथा भक्ति स्वर सम्राट श्री हंसराज रघुवंशी जी का संगम की धरती पर पावन संगम हुआ। संगीत व अध्यात्म के इस दिव्य संगम से सम्पूर्ण वातावरण अध्यात्म, आनंद, ऊर्जा और ईश्वरीय स्पंदनों से अभिसिंचित हो गया। संगम तट पर उपस्थित हजारों श्रद्धालुओं ने इस अनुपम क्षण को हृदय में संजोते हुए अनुभव किया कि जब संतों की वाणी, साधना की शक्ति और संगीत की गूंज एक साथ प्रवाहित होती है, तब वह भूमि स्वयं तीर्थराज के गौरव को नव आयाम प्रदान करती है।
परम पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारत केवल एक भूखंड नहीं, अपितु चेतना, करुणा, संस्कृति और सनातन मूल्यों का जीवंत राष्ट्र है। उन्होंने कहा कि त्रिवेणी संगम केवल नदियों का मिलन नहीं, बल्कि स्वयं, समाज और प्रकृति के समन्वय का प्रतीक है। जब हम अपने भीतर के विकारों को त्यागकर सेवा, साधना और संस्कार को स्वीकार करते है, तभी वास्तविक जीवन-संगम होता है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे अपनी जड़ों से जुड़ें, संस्कृति को आत्मसात करें और राष्ट्र निर्माण में सक्रिय रूप से भागीदार बनें।
बागेश्वरपीठाधीश्वर आचार्य धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री जी ने अपने तेजस्वी वक्तव्य में सनातन धर्म की महिमा, राष्ट्र गौरव और आत्मविश्वास का मंत्र प्रदान किया। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म मानवता, करुणा, शौर्य, संयम और सत्य का अद्वितीय समन्वय है। उन्होंने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि जो समाज अपनी परंपराओं का सम्मान करता है, वही भविष्य का नेतृत्व करता है। भारत की शक्ति उसकी संस्कृति में है, और संस्कृति की शक्ति उसके संस्कारों में है।
संगम की धरती पर भक्ति स्वर सम्राट श्री हंसराज रघुवंशी जी का सुमधुर एवं ओजस्वी गायन हुआ। उनके शिवमय, राष्ट्रमय और भक्तिमय गीतों ने संगम तट को मानो कैलाश की अनुभूति से भर दिया। उनके भजनों की स्वरधारा ने सभी को विभोर कर भक्ति रस में डूबो दिया। उनका गायन स्वयं को परमात्मा से जोड़ने वाला सेतु है। धर्म और विज्ञान, संगीत और साधना, परंपरा और प्रगति, राष्ट्र और मानवता एक सूत्र में पिरोए हुए हैं।
आज जब विश्व दिशाहीनता, तनाव और मूल्यहीनता की चुनौतियों से जूझ रहा है, ऐसे समय में प्रयागराज से उठी यह आध्यात्मिक-सांस्कृतिक ज्योति सम्पूर्ण विश्व को संदेश देती है कि भारत की सनातन परंपरा ही वह प्रकाशपुंज है, जो मानवता को शांति, संतुलन और समरसता का मार्ग दिखा सकती है। संगम से उठी यह चेतना केवल भारत तक सीमित नहीं, बल्कि वैश्विक कल्याण का उद्घोष है।

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