विश्व मरुस्थलीकरण एवं सूखा रोकथाम दिवस के उपलक्ष्य में राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित

देहरादून। सतत भूमि प्रबंधन उत्कृष्टता केंद्र (CoE-SLM), भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE), देहरादून द्वारा 17 जून 2026 को विश्व मरुस्थलीकरण एवं सूखा रोकथाम दिवस (WDCDD) 2026 के उपलक्ष्य में एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस वर्ष की वैश्विक थीम “Rangelands: Recognize. Respect. Restore.”रेंजलैंड एवं चरागाही पारितंत्रों की जैवविविधता संरक्षण, आजीविका समर्थन तथा पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करती है।

WDCDD-2026 के आयोजन के दौरान रेंजलैंड्स के आर्थिक, पारिस्थितिक एवं सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डाला गया। साथ ही, इनके पारंपरिक संरक्षकों के रूप में स्वदेशी एवं पशुपालक समुदायों की भूमिका को पहचानने और सम्मान देने की आवश्यकता पर बल दिया गया तथा रेंजलैंड्स की पुनर्स्थापना एवं सतत प्रबंधन के लिए निवेश बढ़ाने का आह्वान किया गया।

संगोष्ठी में प्रतिष्ठित विशेषज्ञों द्वारा चार विषयगत व्याख्यान प्रस्तुत किए गए। आईसीएआर–भारतीय घास भूमि एवं चारा अनुसंधान संस्थान (IGFRI), झांसी के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. ए.के. शुक्ला ने भारत में रेंजलैंड्स एवं पशुपालक प्रणालियों का पारिस्थितिक महत्वविषय पर व्याख्यान दिया। बेंगलुरु स्थित पारिस्थितिकी एवं पर्यावरण अनुसंधान हेतु अशोका ट्रस्ट (ATREE) के डॉ.  राजकमल गोस्वामी ने रेंजलैंड क्षरण एवं जैवविविधता संरक्षणविषय पर अपने विचार साझा किए।आईसीएफआरई–हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान (HFRI), शिमला की वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. रंजना नेगी ने अल्पाइन एवं उच्च हिमालयी घास भूमियों की पुनर्स्थापना”  विषय पर महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की। गुजरात वन विभाग के भारतीय वन सेवा (IFS) अधिकारी श्री धीरज मित्तल ने बन्नीघास भूमि पुनर्स्थापना एवं सामुदायिक आधारित परिदृश्य प्रबंधनसे प्राप्त अनुभव साझा किए तथा क्षतिग्रस्त परिदृश्यों के पुनर्जीवन एवं सतत पारितंत्र प्रबंधन को बढ़ावा देने में सामुदायिक सहभागिता के महत्व को रेखांकित किया।

इस संगोष्ठी में आईसीएफआरई मुख्यालय तथा इसके विभिन्न संस्थानों के अधिकारियों एवं वैज्ञानिकों ने भाग लिया। यह कार्यक्रम सतत रेंजलैंड प्रबंधन, पारितंत्र पुनर्स्थापना तथा जैवविविधता संरक्षण से संबंधित ज्ञान साझा करने और विचार-विमर्श के लिए एक महत्वपूर्ण मंच सिद्ध हुआ।

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