- तिरंगे के तीन रंगों में झलका भारत का चरित्र, संस्कृति और चेतना
- भारत माता के प्रत्येक प्रतीक का सम्मान ही सच्चे राष्ट्रधर्म की पहचान: स्वामी चिदानन्द सरस्वती

ऋषिकेश। हिमालय की गोद से अविरल बहती माँ गंगा के पावन तट पर स्थित परमार्थ निकेतन में आज राष्ट्रभाव, संस्कृति और आत्मगौरव का सजीव तीर्थ में दर्शन हुये। राष्ट्रीय ध्वज अंगीकरण दिवस के पावन अवसर पर आयोजित सैल्यूट तिरंगा कार्यक्रम के माध्यम से यह संदेश दिया कि तिरंगा केवल आकाश में लहराने वाला ध्वज नहीं, बल्कि भारत की आत्मा, उसके संस्कार, उसके त्याग, उसके साहस और उसकी सनातन चेतना का जीवंत स्वरूप है।

यह विशेष आयोजन पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज के 75वें वर्ष में प्रवेश को भी समर्पित रहा। राष्ट्र, संस्कृति, पर्यावरण और मानवता के लिए उनके सात दशकों से अधिक के प्रेरणादायी जीवन को नमन करते हुए राष्ट्रसेवा को जीवन का संकल्प बनाने का आह्वान किया। कार्यक्रम का शुभारम्भ राष्ट्रध्वज के प्रति सामूहिक वंदन, राष्ट्रगान और भारत माता के जयघोष और रैली के साथ हुआ। सम्पूर्ण परमार्थ गंगा तट तिरंगे की गरिमा, देशभक्ति के भाव और राष्ट्रीय एकता की ऊर्जा से आलोकित हो उठा।

इस अवसर पर पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि भारत की शक्ति केवल उसकी सीमाओं में नहीं, बल्कि उसके संस्कारों में है। तिरंगे का सम्मान जीवनभर निभाया जाने वाला दायित्व है। उन्होंने कहा कि भारत माता वह चेतना है जिसने हमें सत्य, अहिंसा, सेवा, समरसता, सह-अस्तित्व और वसुधैव कुटुम्बकम् का अमूल्य संदेश दिया है। जब हम राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान, संविधान, सैनिक, किसान, गुरु, गंगा, गौ, प्रकृति और अपनी सांस्कृतिक विरासत का सम्मान करते हैं, तभी हमारा राष्ट्रप्रेम पूर्ण होता है।

उन्होंने कहा कि आज समय की आवश्यकता केवल राष्ट्रभक्ति के नारों की नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण के विचारों की है। नारे क्षणिक उत्साह जगा सकते हैं, लेकिन विचार पीढ़ियों का निर्माण करते हैं। इसलिए हमें ऐसा भारत बनाना है जहाँ प्रत्येक नागरिक अपने कर्तव्य को पूजा समझे, सेवा को साधना माने और प्रकृति की रक्षा को राष्ट्ररक्षा का अभिन्न अंग स्वीकार करे।
सैल्यूट तिरंगा राष्ट्रवादी संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री राजेश जी ने कहा कि तिरंगा हमारे अधिकारों से पहले हमारे कर्तव्यों की याद दिलाता है। भारत का भविष्य केवल सरकारों से नहीं, बल्कि जागरूक नागरिकों से निर्मित होगा। उन्होंने युवाओं का आह्वान करते हुए कहा कि डिजिटल युग में भी अपने इतिहास, संस्कृति, स्वतंत्रता सेनानियों और राष्ट्रीय मूल्यों से जुड़े रहना ही सच्ची आधुनिकता है। उन्होंने कहा कि परमार्थ गंगा तट पर ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो माँ गंगा स्वयं भारत की आत्मा को अपने आंचल में समेटकर आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्रप्रेम का अमृत पिला रही हों।
इस पावन अवसर पर श्री मुकेश सिंह जी, श्री सच्चिदानन्द जी, श्री रवि चिंकारा जी, प्रीतम जी, बिजलाल जी, श्री राजेन्द्र फड़के जी, अधिवक्ता श्री अश्विनी जी आदि अनेक विशिष्ट विभूतियां उपस्थित रही।
पूज्य स्वामी चिदानन्द चिदानन्द सरस्वती जी सभी विभूतियों को रूद्राक्ष का दिव्य पौधा उपहार स्वरूप भेंट किया।
