- पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती के पावन सान्निध्य में पूज्य भाई श्री के श्रीमुख से प्रवाहित हो रही श्रीमद् भागवत कथा की ज्ञान गंगा
- श्रीमद् भावगत कथा मानवता के लिए एक जागरण का दिव्य आह्वान
- हरित कथाओं, यूज एंड थ्रो नहीं यूज एंड ग्रो का संकल्प: स्वामी चिदानन्द सरस्वती
- प्रकृति से जो लें, उसे लौटाए: स्वामी चिदानन्द सरस्वती
- तीर्थों में गंदगी करना पाप है: भाई श्री


ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन के दिव्य प्रांगण में पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी के पावन सान्निध्य में पूज्य भाईश्री जी के श्रीमुख से हो रही श्रीमद् भागवत कथा के दूसरे दिन की कथा “ईशावास्यमिदं सर्वम्” के दिव्य सूत्र के साथ प्रकृति व पर्यावरण को समर्पित की।
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने श्रीमद् कथा के दूसरे दिन संदेश दिया, हमारे जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल भौतिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं है, यह जीवन तो आत्मिक उन्नति के लिये है।

आज का युग विज्ञान, तकनीक और प्रगति का युग है, परंतु इसी के साथ भीतर अशांति, तनाव, अकेलापन और असंतुलन भी बढ़ता जा रहा है। ऐसे समय में श्रीमद् भागवत कथा हमें यह स्मरण कराती है कि बाहरी सुखों के पीछे भागते-भागते हम अपने भीतर के आनंद को भूल गए हैं।
श्रीमद् भागवत कथा का दूसरा पर्यावरण और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता को समर्पित किया। आज जब धरती संकट में है, नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं, तब हमें यह समझना होगा कि प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि हमारी माता है। भागवत का प्रत्येक प्रसंग हमें प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीने की प्रेरणा देता है।
पूज्य स्वामी जी ने कथा के माध्यम से अपनी जड़ों से जुड़ें रहने का संदेश देते हुये कहा कि आधुनिकता को अपनाना गलत नहीं, परंतु अपनी संस्कृति, संस्कार और आध्यात्मिक मूल्यों को भूल जाना निश्चित ही एक बड़ी आध्यात्मिक हानि है। श्रीमद् भागवत कथा हमें अपनी पहचान से जोड़ती है।

पूज्य भाई श्री जी ने कहा कि 55 वर्षों की भागवत यात्रा में मुझे पूज्य संतों का अपार प्रेम मिला। उन्होंने कहा कि प्रहृलाद, धु्रव जैसे सभी साधक भागवत है, भागवत का श्रवण करने वाले श्रेता भी भागवत हो जाते हैं।
उन्होंने कहा कि अविरलता में ही निर्मलता बनी रहती है। सरोवर में ठहराव होता है, सरिता में बहाव होता है और समुद्र में गंभीरता होती है वैसे ही हमारे जीवन में एक ठहराव, धैर्य और गंभीरता जरूरी है।
पूज्य भाई श्री जी ने कथा के माध्यम से मानसरोवर और मानससरोवर का बड़ी ही दिव्यता से वर्णन किया।
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने यजमान परिवार और कथा मर्मज्ञ पूज्य भाई श्री जी जी को रूद्राक्ष का पौधा भेंट कर हरित कथाओं, यूज एंड थ्रो नहीं यूज एंड ग्रो का संदेश दिया। पूज्य स्वामी जी ने कहा कि प्रकृति से जो लें, उसे लौटाएँ; जो उपयोग करें, उसे संवारें। एक पौधा केवल पेड़ नहीं, भविष्य का संकल्प है; एक बचाई गई बूंद, आने वाली पीढ़ियों की जीवनरेखा है। यह केवल पर्यावरण की रक्षा नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, हमारी जिम्मेदारी और हमारे अस्तित्व की रक्षा है। आइए, उपभोग से ऊपर उठकर संरक्षण की ओर बढ़ें।
