- परमार्थ निकेतन में श्री हनुमान जयंती के पावन अवसर पर सुंदरकांड का भक्तिमय पाठ सम्पन्न
- परमार्थ निकेतन के हनुमान घाट पर विशेष योग सत्र का आयोजन
- नारी रत्न श्रीमती राजेश्वरी जी मोदी द्वारा ‘कुबेर का खजाना’ विषय पर प्रेरणादायी उद्बोधन
- पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी एवं साध्वी भगवती सरस्वती जी का पावन सान्निध्य एवं उद्बोधन
- पूज्य स्वामी जी ने हनुमान चिंतन एवं हनुमान चालीसा के गहन आध्यात्मिक सूत्रों का कराया दर्शन
- “चौरासी लाख योनियों के चक्र से मुक्ति का सरल मार्ग है हनुमान चालीसा” : स्वामी चिदानन्द सरस्वती

ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन में श्री हनुमान जयंती का पावन पर्व अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ मनाया गया। इस अवसर पर परम पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी एवं साध्वी भगवती सरस्वती जी के पावन सान्निध्य में अनेक आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया, जिसमें देश-विदेश से आये श्रद्धालुओं ने सहभागिता कर आध्यात्मिक ऊर्जा को आत्मसात किया।

प्रातःकालीन बेला में परमार्थ निकेतन के पावन हनुमान घाट पर विशेष योग सत्र का आयोजन किया गया। गंगा तट पर गंगा नन्दिनी जी के मार्गदर्शन में आयोजित इस योग सत्र में प्रतिभागियों ने प्राणायाम, ध्यान और योगाभ्यास के माध्यम से अपने तन-मन को संतुलित करने का अभ्यास किया तथा आध्यात्मिक चेतना का अनुभव किया।
हनुमान जयंती के इस विशेष अवसर पर सुन्दरकांड का सामूहिक पाठ भी अत्यंत श्रद्धा और भक्ति भाव से सम्पन्न हुआ। श्रीरामचरितमानस के सुन्दरकांड का पाठ वातावरण को राममय और भक्तिमय बना गया। भजनों और मंत्रोच्चारण से सम्पूर्ण परिसर में आध्यात्मिक तरंगें प्रसारित होती रहीं, जिससे उपस्थित श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे।

इस अवसर पर नारी रत्न श्रीमती राजेश्वरी जी मोदी ने ‘कुबेर का खजाना’ विषय पर अपने विचार साझा किये। उन्होंने जीवन में सकारात्मक सोच, समृद्धि और आंतरिक संतुलन के महत्व को रेखांकित करते हुए बताया कि सच्चा खजाना बाहरी नहीं, बल्कि हमारे भीतर की संतुष्टि, कृतज्ञता और सेवा भावना में निहित है।
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि “आत्मो मोक्षार्थं जगत् हिताय च” अर्थात् सर्वप्रथम अपना कल्याण आवश्यक है, क्योंकि जब व्यक्ति स्वयं में प्रकाशित नहीं होगा, तो वह दूसरों को प्रकाश नहीं दे सकता। यदि व्यक्ति स्वयं शांत नहीं होगा, तो वह परिवार, समुदाय और संसार को भी शांत नहीं बना सकता। जो हमारे पास होता है, वही हम दे पाते हैं; यदि हमारे भीतर प्रेम होगा, तो हम प्रेम ही बाँटेंगे।
स्वामीजी ने कहा कि यदि हम हनुमान जी के जीवन को ध्यानपूर्वक देखें, तो हमें तीन मुख्य सूत्रों का दर्शन होता है, सेवा, समर्पण और स्मरण। हनुमान जी की प्रभु भक्ति, उनके प्रति प्रेम, समर्पण और निरंतर स्मरण अद्भुत है। उनका सम्पूर्ण जीवन यज्ञमय है। उन्होंने अपने जीवन में कभी भी अहंकार को पनपने नहीं दिया। उसी प्रकार हमें भी जब-जब जीवन में अहंकार आए, उसे प्रभु के चरणों में समर्पित कर अपने जीवन को औषधि बना लेना चाहिए, यही जीवन का सार है।
स्वामीजी ने यह भी कहा कि यदि हनुमान जी को प्रसन्न करना है, तो उसकी शुरुआत श्रीराम जी की भक्ति से करनी चाहिए।
स्वामी जी ने हनुमान चालीसा के गहन आध्यात्मिक सूत्रों का भी विस्तार से वर्णन करते हुए कहा कि हनुमान चालीसा केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाला एक दिव्य मार्गदर्शन है। उन्होंने कहा कि “चौरासी लाख योनियों के चक्र से मुक्ति पाने का सरल और सशक्त साधन हनुमान चालीसा है।”
साध्वी भगवती सरस्वती जी ने अपने उद्बोधन में हनुमान जी के जीवन से प्रेरणा लेने का आह्वान करते हुए कहा कि आज के समय में हमें उनके गुणों निःस्वार्थ सेवा, अटूट विश्वास और पूर्ण समर्पण को अपने जीवन में उतारने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि जब हम अपने जीवन को सेवा और भक्ति के मार्ग पर अग्रसर करते हैं, तभी सच्चे अर्थों में हम आध्यात्मिकता को जी पाते हैं।
परमार्थ सेवा समिति मुम्बई से श्री लक्ष्मीनारायण जी बियानी जी, श्री श्याम सुन्दर आशाराम काबरा जी, श्री गिरधर गोपाल असोपा जी, श्री सनील असोपा जी, श्री रमन शाह जी, श्री मनोज राठी जी, श्री मनमोहन गोयनका जी, श्री रवि लाला पुरिया जी, निशा जैन जी, शशि राठी जी, श्री गोविन्द रेणू सराफ जी, श्रीमती प्रमिला गोयनका जी, श्री हरिनंदन गुप्ता जी, सूरजभान अग्रवाल जी एवं श्री गोपाल जी अनेक विशिष्ट अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति रही।
