परमार्थ निकेतन में तीन दिवसीय मौन रिट्रीट का दिव्य समापन

  • मां गंगा के तट पर मौन की धारा में प्रवाहित हुआ ज्ञान, ध्यान और सेवा का अद्वितीय संगम
  • मौन ही वह सेतु है, जो जीव को शिव से, व्यक्ति को विराट से जोड़ता: स्वामी चिदानन्द सरस्वती

ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन में आयोजित तीन दिवसीय मौन रिट्रीट का आज दिव्य वातावरण में समापन हुआ। मौन रिट्रीट जहाँ शब्द थम जाते हैं और अनुभूति मुखर हो उठी है।
मौन रिट्रीट में देश-विदेश से आए साधकों ने पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी के पावन सान्निध्य में मौन के माध्यम से अपने भीतर के शोर को शांत कर, आत्मिक गहराइयों से संवाद को आत्मसात किया।
परमार्थ निकेतन गंगा जी के तट पर मां गंगा की कल-कल ध्वनि के बीच, ज्ञानरूपी मां सरस्वती की धारा मौन रूप में सतत प्रवाहित हो रही है। यह मौन केवल शब्दों का अभाव नहीं, बल्कि चेतना की प्रखर अवस्था है।
इस रिट्रीट के माध्यम से साधकों ने अनुभव किया कि मौन मुखर भी है और प्रखर भी। जो भीतर की उलझनों को सुलझाने का दिव्य माध्यम है।
मौन, गहन शांति का संचार करता है साथ ही सौहार्द्र और समरसता का वातावरण भी निर्मित करता है। मौन में ही वह शक्ति है, जो मन के विकारों को शांत कर, जीवन को एक नई दिशा प्रदान कर सकती है। मौन, जो शांति भी है, शक्ति भी; जो सौहार्द्र भी है, साधना भी है।
परमार्थ निकेतन में सदैव ही ज्ञान, ध्यान और सेवा की त्रिवेणी बहती रही है। इस रिट्रीट के माध्यम से यह त्रिवेणी और अधिक प्रखर होकर वैश्विक स्तर पर भारतीय संस्कृति के दिव्य प्रवाह को आगे बढ़ा रही है।
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि आज के युवा, के पास बाहरी दुनिया के कोलाहल में उलझने के कई साधन है, इसलिये जरूरी है कि प्रतिदिन कुछ समय मौन के माध्यम से अपने भीतर की शांति को खोजा जाये। सेवा, संवेदना और समर्पण के माध्यम से जीवन को ऊंचाइयों तक ले जाना ही परमार्थ का परम उद्देश्य है।
उन्होंने कहा कि उपनिषदों का ज्ञान मौन की गहराइयों से ही प्रकट हुआ, जहाँ शब्द समाप्त होते हैं, वहीं सत्य का उदय होता है। मौन केवल ध्वनि का अभाव नहीं, बल्कि चेतना का उत्कर्ष है। इसी मौन में ऋषियों ने ब्रह्म का साक्षात्कार किया, इसी में जीवन के परम रहस्य उद्घाटित हुए। मौन ही वह सेतु है, जो जीव को शिव से, व्यक्ति को विराट से जोड़ता है। जब मन शांत होता है, तब आत्मा मुखर होती है; जब विचार थमते हैं, तब अनुभूति जागृत होती है। मौन में ही समर्पण है, मौन में ही विस्तार, यही सनातन का शाश्वत संदेश है।
मां गंगा के सान्निध्य में आयोजित यह रिट्रीट प्रकृति और अध्यात्म के अद्वितीय संगम का प्रतीक है। गंगा की पवित्रता, हिमालय की भव्यता और परमार्थ की साधना, इन तीनों के संगम ने प्रतिभागियों के जीवन को एक नई दिशा प्रदान की। उन्होंने अनुभव किया कि मौन में वह शक्ति है, जो जीवन के हर प्रश्न का उत्तर दे सकती है। देेश विदेश से आये साधकों ने पूज्य स्वामी जी के पावन सान्निध्य में अपनी आध्यात्मिक जिज्ञासाओं को समाधान प्राप्त किया।
योगाचार्य गंगा नन्दिनी, योगाचार्य गायत्री, उमा, रोहन आदि ने योग, ध्यान, मौन एवं मंत्र उच्चारण आदि सत्रों के माध्यम से प्रतिभागियों का मार्गदर्शन किया।

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