परमार्थ निकेतन पहुँचा विदेशियों का दल, आध्यात्मिक अनुभव से हुए अभिभूत

  • पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी से भेंट कर अपनी आध्यात्मिक जिज्ञासाओं का पाया समाधान
  • विश्व विख्यात गंगा आरती में किया सहभाग

ऋषिकेश।  विश्व प्रसिद्ध आध्यात्मिक आश्रम, परमार्थ निकेतन में विभिन्न देशों से आए विदेशी अतिथियों के एक विशेष दल ने भारतीय संस्कृति, अध्यात्म और सनातन मूल्यों का गहनता से अनुभव किया। यह दल भारत की आध्यात्मिक परंपराओं को समझने, योग, ध्यान और जीवन के गूढ़ प्रश्नों के उत्तर खोजने की जिज्ञासा के साथ यहाँ पहुँचा है।
विदेशी अतिथियों ने परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी से भेंट कर अपने जीवन से जुड़े अनेक प्रश्नों पर मार्गदर्शन प्राप्त किया। उन्होंने जीवन के उद्देश्य, तनाव, मानसिक शांति और आत्मिक संतुलन जैसे विषयों पर अपनी जिज्ञासाएँ रखीं। पूज्य स्वामी जी ने अत्यंत सरल और सहज शब्दों में उन्हें बताया कि वास्तविक सुख बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि भीतर की शांति और संतुलन में निहित है। उन्होंने कहा कि जब हम स्वयं से जुड़ते हैं, तभी हम सच्चे अर्थों में जीवन को समझ पाते हैं।
पूज्य स्वामी जी ने कहा कि भारत केवल एक देश नहीं, बल्कि एक जीवंत      संस्कृति और चेतना है, जहाँ हर नदी, पर्वत, वृक्ष और परंपरा में दिव्यता का अनुभव होता है। सनातन धर्म का मूल भाव ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ है, जो पूरे विश्व को एक परिवार के रूप में देखने की प्रेरणा देता है।
विदेशी दल ने परमार्थ निकेतन में योग और ध्यान सत्रों में भी भाग लिया। उन्होंने अनुभव किया कि योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि शरीर, मन और स्वयं से जुड़ने की एक समग्र प्रक्रिया है। ध्यान के माध्यम से उन्होंने आंतरिक शांति और एकाग्रता का अनुभव किया, जो आधुनिक जीवन की भागदौड़ में अत्यंत आवश्यक है।
संध्या समय सभी अतिथियों ने विश्व विख्यात गंगा आरती में सहभाग किया। विदेशी अतिथियों ने कहा कि यह अनुभव उनके जीवन का एक अविस्मरणीय क्षण है। उन्होंने महसूस किया कि यहाँ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि  प्रकृति, संस्कृति और आध्यात्म का अद्भुत संगम होता है।
विदेशी अतिथियों ने बताया कि आधुनिक जीवनशैली में भौतिक सुख-सुविधाओं की भरमार के बावजूद मानसिक शांति की कमी है। ऐसे में भारत, जो आध्यात्मिक केंद्र है उन्हें संतुलन और सुकून प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि धार्मिक स्थलों पर आना केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि आत्मिक विकास की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल भौतिक उपलब्धियाँ नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति भी है।
भारत की आध्यात्मिक धरोहर आज भी विश्व को आकर्षित कर रही है और लोगों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला रही है। धार्मिक स्थलों की यात्रा केवल पर्यटन नहीं तीर्थाटन की यात्रा है, जो हमें स्वयं से जोड़ती है, संतुलित बनाती है और जीवन को एक नई दिशा प्रदान करती है।

More From Author

बैसाखी पर सीएम धामी से सिक्ख प्रतिनिधिमंडल की भेंट, सौंपा सरोपा

चारधाम यात्रा पंजीकरण हेतु ट्राजिट कैम्प ऋषिकेश में 30 पंजीकरण कांउटर सहित 30 मोबाईल टीमें तैनात

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent Comments

No comments to show.