श्रीराम नवमी का पावन उत्सव भारतीय संस्कृति, सनातन परंपरा और धर्ममूल्यों की दिव्य अभिव्यक्ति का पावन दिन: स्वामी चिदानन्द सरस्वती

ऋषिकेश। श्रीराम नवमी का पावन उत्सव भारतीय संस्कृति, सनातन परंपरा और धर्ममूल्यों की दिव्य अभिव्यक्ति का पावन दिन है। आज भगवान श्रीराम के अवतरण के उत्सव का दिन है, साथ ही उनके जीवन में निहित मर्यादा, सत्यनिष्ठा, साहस, धैर्य और करुणा जैसे दिव्य गुणों को आत्मसात करने का भी पावन अवसर है। प्रभु श्रीराम ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ के रूप में आदर्श जीवन के शाश्वत प्रेरणास्रोत हैं।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि भगवान श्रीराम का संपूर्ण जीवन मानवता के लिए एक खुला ग्रंथ है, जिसमें प्रत्येक परिस्थिति में धर्म का पालन करने की प्रेरणा मिलती है। अयोध्या के राजकुमार होते हुए भी उन्होंने पिता के वचन की मर्यादा हेतु राज्य, वैभव और सुखों का त्याग कर वनवास स्वीकार किया।
श्रीराम का साहस केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं था, बल्कि उनके धैर्य और संयम में भी वह वीरता झलकती है। वनवास के कठिन वर्षों में उन्होंने अनेक विपत्तियों का सामना किया, किंतु कभी विचलित नहीं हुए। सीता माता के हरण के पश्चात भी उन्होंने क्रोध या आवेग में निर्णय नहीं लिया, बल्कि धैर्य, बुद्धि और रणनीति के साथ आगे बढ़ते हुए धर्मयुद्ध का मार्ग चुना। यह हमें संदेश देता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य और विवेक ही सच्ची विजय का आधार हैं।
भगवान श्रीराम की करुणा और समता भाव अद्भुत है। निषादराज, शबरी, हनुमान और वानर सेना के साथ उनका स्नेह अद्भुत था। वे प्रत्येक प्राणी में ईश्वर का अंश देखते थे। यही समभाव सनातन धर्म की आत्मा है, जो समस्त सृष्टि को एक परिवार के रूप में स्वीकार करता है यही तो “वसुधैव कुटुम्बकम्” का सार है।
श्रीराम का जीवन आदर्श नेतृत्व का भी अद्वितीय उदाहरण है। उन्होंने केवल शासन नहीं किया, बल्कि ‘रामराज्य’ की स्थापना की, जो न्याय, समानता, धर्म और समृद्धि का प्रतीक है। उनके शासन में प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान, सुरक्षा और न्याय प्राप्त था। आज के युग में भी यदि हम उनके आदर्शों को अपनाएं, तो समाज में शांति, सद्भाव और नैतिकता का पुनर्स्थापन संभव है।
जीवन में मर्यादा का पालन ही वास्तविक महानता है। आधुनिक जीवन की भागदौड़ में जब मूल्य और संस्कार कहीं पीछे छूटते प्रतीत होते हैं, तब श्रीराम का चरित्र हमें पुनः हमारी जड़ों से जोड़ता है।
यह पर्व आत्ममंथन का अवसर है। हम अपने जीवन में सत्य, मर्यादा, करुणा और धैर्य जैसे गुणों को स्थान दे। परिवारों में संस्कारों का संचार करें, समाज में सद्भाव और एकता को बढ़ावा दें, तथा राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका को समझें। श्रीराम का जीवन हमें संदेश देता है कि जब व्यक्ति स्वयं को धर्म के मार्ग पर स्थापित करता है, तब वह केवल अपने जीवन को ही नहीं, बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र को भी प्रकाशमान कर सकता है।
आइए, इस श्रीराम नवमी पर हम सभी यह संकल्प लें कि हम अपने जीवन को श्रीराम के आदर्शों के अनुरूप ढालें और सनातन संस्कृति की इस दिव्य परंपरा को आगे बढ़ाते हुए समाज और राष्ट्र को नई दिशा प्रदान करें।

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