सिख पंथ के छठे गुरु, ‘मीरी-पीरी’ के प्रवर्तक एवं महान ‘सैन्य-संत’ गुरु श्री हरगोबिंद साहिब जी महाराज के प्रकाश पर्व पर परमार्थ निकेतन से अनंत शुभकामनाएँ

  • आध्यात्मिक शक्ति और सामाजिक उत्तरदायित्व साथ-साथ चलें तो समाज में विलक्षण परिवर्तन सम्भव: स्वामी चिदानन्द सरस्वती

ऋषिकेश। सिख पंथ के छठे गुरु, ‘मीरी-पीरी’ के दिव्य सिद्धांत के प्रवर्तक, धर्मरक्षक एवं महान ‘सैन्य-संत’ गुरु श्री हरगोबिंद साहिब जी महाराज के पावन प्रकाश पर्व के अवसर पर परमार्थ निकेतन परिवार से हार्दिक शुभकामनाएँ।

इस पावन अवसर पर परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष, परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि गुरु श्री हरगोबिंद साहिब जी महाराज का जीवन धर्म, अध्यात्म, साहस, करुणा, आत्मसम्मान और राष्ट्रसेवा का अद्भुत संगम है। उन्होंने यह संदेश दिया कि जब धर्म, सत्य और मानवता पर संकट आए, तब केवल आध्यात्मिक चेतना ही नहीं, साहस एवं संकल्प भी उतना ही आवश्यक है। उनका जीवन प्रेरणा देता है कि आध्यात्मिक शक्ति और सामाजिक उत्तरदायित्व साथ-साथ चलें तो समाज में विलक्षण परिवर्तन सम्भव है।

गुरु श्री हरगोबिंद साहिब जी ने ‘मीरी-पीरी’ की महान परंपरा स्थापित कर यह स्पष्ट किया कि आध्यात्मिक सत्ता (पीरी) और लौकिक उत्तरदायित्व (मीरी) परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। उन्होंने दो तलवारें धारण कर यह संदेश दिया कि जीवन में शास्त्र का ज्ञान और शस्त्र का साहस, दोनों का संतुलन आवश्यक है। शास्त्र हमें सत्य, करुणा, विवेक और आत्मज्ञान का मार्ग दिखाते हैं, जबकि शस्त्र धर्म, न्याय और निर्दाेषों की रक्षा का संकल्प प्रदान करते हैं। यह संतुलित दृष्टिकोण आज के समय में भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उस युग में था।

पूज्य स्वामी जी ने कहा कि गुरु साहिब का संपूर्ण जीवन हमें अन्याय, अत्याचार और भय के विरुद्ध निर्भीक होकर खड़े होने की प्रेरणा देता है। उन्होंने समाज में आत्मबल, संगठन, अनुशासन और सेवा की भावना को जागृत किया। उनके आदर्श यह संदेश देते है कि वास्तविक शक्ति आत्मबल, सत्यनिष्ठा, नैतिकता और ईश्वर में अटूट विश्वास में निहित होती है।

आज जब विश्व अनेक प्रकार की चुनौतियों, हिंसा, असहिष्णुता, सामाजिक विभाजन, नैतिक मूल्यों के क्षरण तथा पर्यावरणीय संकट का सामना कर रहा है, तब गुरु श्री हरगोबिंद साहिब जी की शिक्षाएँ और अधिक प्रासंगिक हो जाती हैं। उनका जीवन हमें यह संदेश देता है कि धर्म का वास्तविक स्वरूप मानवता की रक्षा, सभी के सम्मान, न्याय की स्थापना और प्रेमपूर्ण सहअस्तित्व में निहित है। यदि समाज गुरु साहिब के आदर्शों को आत्मसात करे तो एक अधिक न्यायपूर्ण, शांतिपूर्ण और समरस विश्व की स्थापना संभव है।

पूज्य स्वामी जी ने कहा कि भारत की महान आध्यात्मिक परंपरा सदैव विविधता में एकता, परस्पर सम्मान और सभी धर्मों के प्रति आदर की भावना को पोषित करती रही है। गुरु श्री हरगोबिंद साहिब जी का जीवन इस सनातन भारतीय चेतना का उज्ज्वल उदाहरण है, जहाँ आध्यात्मिकता केवल व्यक्तिगत साधना तक सीमित नहीं रहती, बल्कि समाज, राष्ट्र और संपूर्ण मानवता के कल्याण का माध्यम बनती है। उनकी शिक्षाएँ हमें यह स्मरण कराती हैं कि धर्म का सर्वाेच्च स्वरूप सेवा, करुणा, न्याय और लोकमंगल है।

पूज्य स्वामी जी ने युवाओं का आह्वान करते हुए कहा कि वे हमारे पूज्य संतों व महापुरूषों के जीवन से प्रेरणा लेकर अपने चरित्र का निर्माण करें, सत्य एवं नैतिक मूल्यों को जीवन का आधार बनाएँ, राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करें तथा सेवा, सद्भाव और मानवता के मार्ग पर अग्रसर रहें। स्वयं अनुशासित हो, समाज के लिए समर्पित हो और प्रत्येक परिस्थिति में सत्य एवं न्याय का साथ दे।

प्रकाश पर्व के इस पावन अवसर पर परमार्थ निकेतन से सभी श्रद्धालुओं अनंत शुभकामनायें।

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