- “जब गाँव में एक पुस्तकालय खुलता है, तब केवल किताबों के पन्ने नहीं खुलते, बल्कि हजारों सपनों का भविष्य भी उज्ज्वल होने लगता है।”

खटीमा। उत्तराखण्ड के जनपद ऊधम सिंह नगर के विकासखण्ड खटीमा में कन्हैया महिला सहकारिता द्वारा संचालित “दीदी की लाइब्रेरी” इस बात का सशक्त उदाहरण है कि जब समुदाय का विश्वास, महिलाओं का नेतृत्व और प्रशासन का दूरदर्शी सहयोग एक साथ मिलते हैं, तो एक सामुदायिक पहल शिक्षा, आजीविका और सामाजिक परिवर्तन का प्रभावी माध्यम बन जाती है। आज यह पुस्तकालय केवल अध्ययन का स्थान नहीं, बल्कि ग्रामीण युवाओं के सपनों, महिलाओं की आत्मनिर्भरता और सामुदायिक विकास का प्रेरणादायी केन्द्र बन चुका है।

खटीमा विकासखण्ड के अनेक ग्रामीण विद्यार्थी प्रतियोगी परीक्षाओं, बोर्ड परीक्षाओं एवं उच्च शिक्षा की तैयारी कर रहे थे। यद्यपि क्षेत्र में निजी स्तर पर अध्ययन की कुछ सुविधाएँ उपलब्ध थीं, किन्तु वे सभी विद्यार्थियों के लिए समान रूप से सुलभ या किफायती नहीं थीं। विशेषकर ग्रामीण एवं आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के विद्यार्थियों के लिए नियमित रूप से शांत, सुव्यवस्थित एवं गुणवत्तापूर्ण अध्ययन वातावरण प्राप्त करना एक बड़ी चुनौती थी। दूसरी ओर, कन्हैया महिला क्लस्टर स्तरीय स्वयं सहायता सहकारिता से जुड़ी महिलाएँ भी ऐसा स्थायी सामुदायिक उद्यम स्थापित करना चाहती थीं, जिससे उन्हें नियमित आय प्राप्त हो, समाज को लाभ मिले और उनकी पहचान केवल स्वयं सहायता समूहों तक सीमित न रहकर सफल महिला उद्यमियों के रूप में स्थापित हो सके।
इन्हीं आवश्यकताओं को समझते हुए IFAD-वित्तपोषित ग्रामोत्थान (REAP) परियोजना ने महिलाओं के साथ मिलकर एक दूरदर्शी पहल की। सामूहिक विचार-विमर्श एवं प्रशासनिक मार्गदर्शन के उपरांत CBO Level गैर-कृषि आधारित उद्यम के रूप में “दीदी की लाइब्रेरी” की स्थापना का निर्णय लिया गया। यह केवल एक उद्यम नहीं था, बल्कि शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और सामुदायिक विकास को एक साथ जोड़ने वाला एक अभिनव मॉडल था।
इस सामुदायिक पहल को साकार करने के लिए ग्रामोत्थान (REAP) परियोजना द्वारा ₹6,00,000 की वित्तीय सहायता प्रदान की गई। जिला सहकारी बैंक, खटीमा से ₹3,00,000 का बैंक ऋण स्वीकृत कराया गया, जबकि कन्हैया महिला क्लस्टर स्तरीय स्वयं सहायता सहकारिता ने स्वयं ₹1,00,000 का निवेश किया। इसके अतिरिक्त राज्य वित्त एवं CSR के अभिसरण से भी अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध कराए गए। परियोजना के संस्थागत सहयोग के अंतर्गत खण्ड विकास कार्यालय, खटीमा परिसर में पुस्तकालय संचालन हेतु भवन उपलब्ध कराया गया तथा आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप इसे विकसित किया गया।
निर्माण कार्य पूर्ण होने के उपरांत 25 मई 2026 को उत्तराखण्ड के माननीय मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा दीदी की लाइब्रेरी का लोकार्पण किया गया। जून 2026 से इसका नियमित संचालन प्रारम्भ हुआ और शीघ्र ही यह ग्रामीण विद्यार्थियों के लिए एक आधुनिक एवं सुव्यवस्थित अध्ययन केन्द्र के रूप में स्थापित हो गई।
आज इस पुस्तकालय में वातानुकूलित अध्ययन कक्ष, शांत एवं स्वच्छ वातावरण, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों के लिए पृथक रीडिंग ज़ोन तथा विद्यालय एवं महाविद्यालय के विद्यार्थियों के लिए सुविधाजनक बैठने की व्यवस्था उपलब्ध है। दीदी की लाइब्रेरी ने विद्यार्थियों के लिए एक बेहतर और सुलभ अध्ययन विकल्प उपलब्ध कराया है। अब उन्हें अपने ही विकासखण्ड में अनुशासित, शांत एवं गुणवत्तापूर्ण अध्ययन वातावरण प्राप्त हो रहा है, जिससे अध्ययन के लिए अनावश्यक आवागमन कम हुआ है और समय तथा आर्थिक व्यय दोनों में कमी आई है।
इस पहल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि पुस्तकालय का सम्पूर्ण संचालन स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएँ कर रही हैं। सदस्य प्रबंधन, सदस्यता संचालन, अभिलेख संधारण तथा वित्तीय गतिविधियों का सफलतापूर्वक संचालन कर रही हैं। इससे उनमें नेतृत्व क्षमता, आत्मविश्वास एवं उद्यमिता का उल्लेखनीय विकास हुआ है तथा उन्हें सम्मानजनक और नियमित आजीविका का नया माध्यम प्राप्त हुआ है।
परिणाम भी अत्यंत उत्साहवर्धक रहे। संचालन प्रारम्भ होने के मात्र दो महीनों (जून एवं जुलाई 2026) में ही दीदी की लाइब्रेरी ने ₹32,020 की आय अर्जित की तथा ₹16,580 का शुद्ध लाभ प्राप्त किया। वर्तमान में यहाँ लगभग 50 विद्यार्थी नियमित रूप से अध्ययन कर रहे हैं। यह उपलब्धि इस बात का प्रमाण है कि सामाजिक उद्देश्य से स्थापित यह सामुदायिक उद्यम आर्थिक रूप से भी निरंतर सफलता की ओर अग्रसर है।
आज दीदी की लाइब्रेरी का प्रभाव केवल महिलाओं की आय बढ़ाने तक सीमित नहीं है। इस पहल ने पूरे क्षेत्र में शिक्षा के प्रति सकारात्मक वातावरण विकसित किया है। अभिभावकों का विश्वास बढ़ा है, विद्यार्थियों में नियमित अध्ययन की संस्कृति विकसित हुई है और महिलाओं को सम्मानजनक आय के साथ समाज में नई पहचान मिली है। यह मॉडल स्पष्ट करता है कि जब शिक्षा और आजीविका को एक साथ जोड़ा जाता है, तब उसका लाभ केवल कुछ व्यक्तियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे समुदाय के सामाजिक एवं आर्थिक विकास का आधार बन जाता है।
इस सफलता के पीछे IFAD-वित्तपोषित ग्रामोत्थान (REAP) परियोजना, जिला परियोजना प्रबंधन इकाई, मुख्य विकास अधिकारी, खण्ड विकास अधिकारी तथा संबंधित विभागों का सतत मार्गदर्शन एवं समन्वित सहयोग रहा है। उनके सामूहिक प्रयासों ने इस नवाचार को सफलतापूर्वक धरातल पर उतारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आज “दीदी की लाइब्रेरी” केवल एक पुस्तकालय नहीं, बल्कि सामुदायिक नेतृत्व आधारित शिक्षा एवं महिला उद्यमिता का एक सफल मॉडल बन चुकी है। यह पहल दर्शाती है कि जब स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं को अवसर, संस्थागत सहयोग और उचित संसाधन उपलब्ध कराए जाते हैं, तो वे केवल अपनी आजीविका ही नहीं बढ़ातीं, बल्कि समाज की वास्तविक आवश्यकताओं को पूरा करने वाले स्थायी सामुदायिक उद्यम भी स्थापित करती हैं। IFAD-वित्तपोषित ग्रामोत्थान (REAP) परियोजना का यही दृष्टिकोण ग्रामीण उत्तराखण्ड में आत्मनिर्भरता, नवाचार और समावेशी विकास को नई दिशा दे रहा है।
“जब महिलाओं के हाथों में नेतृत्व, समुदाय का विश्वास और विकास की सही दिशा होती है, तब एक छोटा-सा सामुदायिक प्रयास भी पूरे क्षेत्र की तकदीर बदल सकता है।”
“दीदी की लाइब्रेरी” आज इसी विश्वास का जीवंत उदाहरण है। यह केवल ज्ञान का केन्द्र नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर उत्तराखण्ड, महिला सशक्तिकरण और सामुदायिक विकास की दिशा में बढ़ता हुआ एक प्रेरणादायक कदम है।
