अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस: विद्या का प्रकाश और सुरक्षा का विश्वास, बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की नींव

  • “विद्या वह ज्योति है, जो नेत्रों को नहीं, अंतःकरण को भी प्रकाशित करती है”


ऋषिकेश। अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस के अवसर पर परमार्थ निकेतन की ओर से समस्त बालक-बालिकाओं, युवाओं, शिक्षकों, अभिभावकों और समाज के सभी जागरूक नागरिकों को हार्दिक शुभकामनाएँ। यह दिन हमें स्मरण कराता है कि साक्षरता केवल अक्षरों को पहचानने, शब्दों को पढ़ने या हस्ताक्षर करने की क्षमता ही नहीं, बल्कि अपने अधिकारों को समझने, अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने और जीवन को गरिमा, स्वतंत्रता तथा आत्मविश्वास के साथ जीने की शक्ति है।

विद्या को जीवन का प्रकाश है। विद्या हमें केवल ज्ञानवान ही नहीं बनाती, बल्कि विवेकवान, संवेदनशील और उत्तरदायी भी बनाती है। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि ऐसा चरित्रवान समाज निर्मित करना है, जहाँ ज्ञान के साथ संस्कार, अधिकारों के साथ कर्तव्य और प्रगति के साथ करुणा भी हो।

आज भी अनेक बालक-बालिकाएँ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित हैं। कहीं आर्थिक कठिनाइयाँ हैं, कहीं विद्यालयों तक पहुँच का अभाव है, कहीं डिजिटल संसाधनों की कमी है और कहीं सामाजिक परिस्थितियाँ बच्चों की शिक्षा में बाधा बनती हैं। अनेक परिवारों में बालिकाओं की शिक्षा को लेकर अभी भी असमान दृष्टिकोण दिखाई देता है। कुछ बच्चे विद्यालय पहुँचने से पहले ही श्रम, पारिवारिक जिम्मेदारियों या अन्य परिस्थितियों के कारण पढ़ाई छोड़ देते हैं।

इन समस्याओं के साथ एक और अत्यंत महत्वपूर्ण विषय जुड़ा है, बच्चों की सुरक्षा। शिक्षा का वातावरण तभी सार्थक हो सकता है, जब प्रत्येक बालक-बालिका विद्यालय, छात्रावास, गुरुकुल और अन्य शैक्षणिक संस्थानों में सुरक्षित, सम्मानपूर्ण एवं भयमुक्त अनुभव करे। किसी भी बच्चे को हिंसा, शोषण, भेदभाव, उपेक्षा या भय के वातावरण में शिक्षा प्राप्त करने के लिए विवश नहीं होना चाहिए।

शिक्षा और सुरक्षा एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। जिस प्रकार ज्ञान का प्रकाश अज्ञान के अंधकार को दूर करता है, उसी प्रकार सुरक्षित वातावरण भय को दूर कर आत्मविश्वास का निर्माण करता है। अतः प्रत्येक शैक्षणिक संस्था का दायित्व है कि वह बच्चों के लिए केवल पाठ्यक्रम और परीक्षाओं की व्यवस्था न करे, बल्कि उनके शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक कल्याण को भी सर्वोच्च प्राथमिकता दे।

इन चुनौतियों का समाधान केवल सरकारी योजनाओं या विद्यालयों की संख्या बढ़ाने से नहीं होगा। इसके लिए परिवार, विद्यालय, समाज, प्रशासन और स्वयंसेवी संस्थाओं को मिलकर एक समग्र दृष्टिकोण अपनाना होगा।

शिक्षा की गुणवत्ता और संस्कारों पर समान ध्यान देना होगा। बच्चों को केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं, बल्कि सत्य, अहिंसा, करुणा, स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण, अनुशासन और सेवा के संस्कार भी दिए जाएँ। शिक्षा ऐसी हो, जो बच्चों को प्रश्न पूछने, विचार करने, सही निर्णय लेने और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझने के लिए प्रेरित करे।

सुरक्षित शैक्षणिक वातावरण के लिए स्पष्ट और प्रभावी व्यवस्था आवश्यक है। विद्यालयों और छात्रावासों में सुरक्षा मानकों का नियमित निरीक्षण हो। भवनों, विद्युत व्यवस्था, अग्नि सुरक्षा, स्वच्छ पेयजल, स्वच्छ शौचालय और आपातकालीन व्यवस्थाओं पर विशेष ध्यान दिया जाए।

आज आवश्यकता है कि हम बच्चों को केवल सफल बनने की नहीं, बल्कि सार्थक जीवन जीने की शिक्षा दें। उन्हें प्रकृति से प्रेम करना, जल का संरक्षण करना, समाज के कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशील रहना और अपने ज्ञान का उपयोग लोककल्याण के लिए करना सिखाएँ। जब शिक्षा जीवन-मूल्यों से जुड़ती है, तब वह व्यक्ति के साथ-साथ समाज का भी उत्थान करती है।

आइए, इस दिन हम केवल साक्षरता का उत्सव न मनाएँ, बल्कि शिक्षा के अधिकार, बच्चों की सुरक्षा और मानव गरिमा की रक्षा के लिए अपने संकल्प को जीवन में उतारें।

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