देसंविवि में दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय क्रांफ्रेंस का शुभारंभ

  • समाज की कुरीतियों का उन्मूलन शस्त्र से नहीं, प्रज्ञा से संभव : पद्मश्री सुरेश सोनी
  • आज चिंतन के साथ सद्कर्म करने की आवश्यकता : डॉ चिन्मय पण्ड्या

हरिद्वार। देवसंस्कृति विश्वविद्यालय शांतिकुंज तथा वल्र्ड एसोसिएशन आफ हिन्दु एकेडमिसिएंस (वाहा) के संयुक्त तत्वावधान में हिन्दुत्व से विकसित भारत विषय पर दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय कांफ्रेंस तथा देसंविवि व भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर) के संयुक्त तत्वावधान आयोजित हो रहे राष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ हुआ। इस अवसर पर डॉ चिन्मय पण्ड्या, आरएसएस के सह सरकार्यवाह पद्मश्री सुरेश सोनी, प्रो. नचिकेता तिवारी सहित अन्य अतिथियों ने दीप प्रज्वलन किया।
उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि आरएसएस के सह सरकार्यवाह पद्मश्री सुरेश सोनी ने कहा कि ऋग्वेद का मंत्र हमें मनुर्भव (मनुष्य बनो) का संदेश देता है, ताकि समाज में दिव्यता का अवतरण हो सके। यदि समाज को सभ्य बनाना है, तो संस्कार और संस्कृति ही इसके आधारभूत माध्यम हैं। श्री सोनी ने कहा कि वर्तमान में समाज की कुरीतियों का उन्मूलन शस्त्र से नहीं, अपितु प्रज्ञा (सद्ज्ञान) के माध्यम से ही संभव है, क्योंकि प्रज्ञा के लोप होने से कुल, वैभव और चहुंमुखी समृद्धि का विनाश निश्चित है। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा और ऋषि चिंतन को जन सामान्य की चर्चाओं में पुन: प्रतिष्ठित करने हेतु प्रेरित किया।


उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कर रहे देसंविवि के प्रतिकुलपति डॉ चिन्मय पण्ड्या ने कहा कि वर्तमान समय केवल विचार-विमर्श का नहीं, बल्कि सत्संकल्पों को जीवन में उतारने का है। उन्होंने कहा कि यह परिवर्तन का युग है और समाज को सजग होकर सकारात्मक दिशा में आगे बढऩे की आवश्यकता है। युगऋषि पं श्रीराम शर्मा आचार्यश्री के संदेशों का उल्लेख करते हुए कहा कि मानवता के सामने उपस्थित संकटों को अब स्थायी रूप से समाप्त करने का समय आ गया है। सनातन संस्कृति के संवाहक डॉ. पण्ड्या ने भारत की आध्यात्मिक विरासत पर प्रकाश डालते हुए कहा कि दया, करुणा, ममता और प्रेम जैसे उच्च जीवन-मूल्यों का सर्वाधिक विकास भारत की पावन धरती पर हुआ है। जब विश्व के अनेक हिस्सों में संघर्ष और हिंसा का वातावरण था, तब भारत ने सदैव मानवता को वसुधैव कुटुम्बकम् का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि आत्म विस्मृति, आत्म हीनता और सामाजिक विखंडन हमारी प्रमुख समस्याएँ हैं। इनसे ऊपर उठकर समाज को एकता, आत्मविश्वास और सेवा की भावना को अपनाना होगा।
इस अवसर पर वाहा व आईसीएसएसआर के अनेक वरिष्ठ अधिकारियों को प्रतिकुलपति डॉ चिन्मय पण्ड्या ने देसंविवि शांतिकुंज के प्रतीक चिह्न, युगसाहित्य आदि भेंटकर सम्मानित किया। साथ ही डॉ चिन्मय पण्ड्या, पद्मश्री सुरेश सोनी सहित अन्य अतिथियों ने हिन्दू स्टडीज सहित अनेक पत्रिकाओं के नवीन अंक का विमोचन किया।
इस दौरान शांतिकुंज व्यवस्थापक श्री योगेन्द्र गिरि, हसन विश्वविद्यालय कर्नाटक के कुलपति प्रो. टी. सी. तारानाथ, विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष श्री आलोक कुमार, विश्व हिंदू परिषद के संयुक्त महासचिव स्वामी विज्ञाननंद, विश्व हिंदू परिषद के संगठन सचिव श्री मिळिंद परांडे, गुजरात केंद्रीय विद्यालय के कुलपति श्री अतुल भट्टाचार्य सहित देवसंस्कृति विवि व शांतिकुंज परिवार के अनेक स्वयंसेवक उपस्थित रहे।

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