परमार्थ निकेतन में शारदीय नवरात्रि पर माँ भगवती की उपासना, पूजन-अर्चन और विश्वकल्याण की मंगलकामना

  • माँ आदिशक्ति की आराधना और विश्वकल्याण की प्रार्थना से गूँजा गंगा तट
  • अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस व नवरात्रि पर परमार्थ निकेतन से संदेश कन्याओं को जिमाएँ भी और जमाएँ भी! अर्थात् अपने पैरों पर भी खड़ा करें, उन्हें उडान दें, पहचान दें, सम्मान दें
  • नवरात्रि, स्वयं के भीतर की शक्ति को जागृत करने का महापर्व: स्वामी चिदानन्द सरस्वती

ऋषिकेश। हिमालय की पावन गोद, माँ गंगा के निर्मल तट पर स्थित परमार्थ निकेतन में शारदीय नवरात्रि का शुभारम्भ अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास के साथ हुआ। माँ आदिशक्ति की आराधना, विधि-विधानपूर्वक पूजन-अर्चन, मंत्रोच्चार और विश्वकल्याण की मंगलकामनाओं के बीच सम्पूर्ण वातावरण दिव्यता, सकारात्मकता और सनातन संस्कृति की सुगंध से सुवासित हो उठा।

शारदीय नवरात्रि भारतीय संस्कृति का एक अत्यंत पावन पर्व है, जो शक्ति की उपासना के साथ आत्मशुद्धि, साधना, संयम और अंतःचेतना के जागरण का संदेश देता है। यह पर्व हमें स्मरण कराता है कि परमात्मा की शक्ति केवल ब्रह्मांड की विराटता में ही नहीं, बल्कि प्रत्येक जीव के भीतर भी विद्यमान है। जब हम अपने भीतर की दिव्यता को पहचानता है, तब जीवन श्रद्धा, साहस, करुणा और सद्कर्मों से आलोकित होने लगता है।

परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि नवरात्रि, स्वयं को जानने, अपने भीतर की शक्तियों को जागृत करने और जीवन को श्रेष्ठ बनाने का अनुपम अवसर है। माँ दुर्गा की उपासना के माध्यम से हम अपने भीतर के अज्ञान, अहंकार, क्रोध, लोभ और नकारात्मकता पर विजय प्राप्त करें तथा सत्य, धर्म, प्रेम और करुणा के मार्ग पर आगे बढ़ते रहे।

पूज्य स्वामी जी ने कहा कि सनातन संस्कृति में शक्ति को सृष्टि का मूल आधार माना गया है। माँ आदिशक्ति सृजन, संरक्षण, साहस, करुणा और परिवर्तन की दिव्य चेतना हैं। नवरात्रि हमें उसी चेतना से जुड़ने और उसे अपने विचारों, व्यवहार तथा कर्मों में अभिव्यक्त करने की प्रेरणा देती है।

उन्होंने कहा कि श्रीदुर्गासप्तशती, जो मार्कण्डेय पुराण का महत्त्वपूर्ण अंग है, देवी महिमा, शक्ति उपासना और धर्म की स्थापना का दिव्य संदेश देती है। देवी माहात्म्य में माँ दुर्गा के महिषासुर-मर्दिनी स्वरूप के माध्यम से यह प्रतिपादित होता है कि जब अधर्म, अहंकार और आसुरी प्रवृत्तियाँ बढ़ती हैं, तब धर्म और संतुलन की स्थापना के लिए दिव्य शक्ति का आविर्भाव होता है।

नवरात्रि के नौ दिनों में माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की उपासना की जाती है। माँ शैलपुत्री दृढ़ता और श्रद्धा, माँ ब्रह्मचारिणी तप एवं साधना, माँ चंद्रघंटा साहस, माँ कूष्मांडा सृजनशक्ति, माँ स्कंदमाता वात्सल्य, माँ कात्यायनी शक्ति, माँ कालरात्रि निर्भयता, माँ महागौरी पवित्रता और माँ सिद्धिदात्री सिद्धि एवं पूर्णता की प्रेरणा देती हैं। इन नौ स्वरूपों की आराधना जीवन में नौ दिव्य गुणों को जागृत करने की साधना भी है।
पूज्य स्वामी जी ने कहा कि नवरात्रि की साधना हमारे जीवन में सेवा, सद्भाव और संवेदनशीलता के रूप में प्रकट हो। माँ दुर्गा की आराधना तभी सार्थक होगी, जब प्रत्येक बेटी को शिक्षा, सुरक्षा और सम्मान मिले; प्रत्येक नारी को समान गरिमा प्राप्त हो; और समाज के प्रत्येक वंचित व्यक्ति तक सहयोग एवं करुणा पहुँचे।

उन्होंने कहा कि व्रत का अर्थ केवल आहार का संयम नहीं, बल्कि विचारों और व्यवहार की शुद्धि भी है। जप के साथ आत्मचिंतन, उपासना के साथ सदाचार और भक्ति के साथ सेवा का समन्वय ही नवरात्रि की साधना को पूर्णता प्रदान करता है। जब हमारा मन निर्मल, वाणी मधुर और कर्म परोपकार से युक्त होते हैं, तब हमारा सम्पूर्ण जीवन माँ भगवती के चरणों में अर्पित एक पुष्प बन जाता है।

माँ भगवती सभी के जीवन में शक्ति, शांति और सद्बुद्धि का संचार करें। प्रत्येक हृदय में करुणा, प्रत्येक घर में मंगल और सम्पूर्ण विश्व में प्रेम एवं सद्भाव की अविरल धारा प्रवाहित हो।

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