पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती एवं पूज्य साध्वी भगवती सरस्वती ने अमेरिका में मनाया रक्षाबंधन

  • रक्षाबंधन प्रेम और संरक्षण की संस्कृति का पर्व: स्वामी चिदानन्द
  • प्रेम की डोर, संस्कृति का सुंदर उत्सव-रक्षाबंधन
  • पौधों को रक्षासूत्र बांधकर दिया प्रकृति संरक्षण का संदेश
  • श्रावणी पूर्णिमा पर परमार्थ ऋषिकुमारों का उपनयन संस्कार, वेदमंत्रों से हुआ पूजन-अर्चन और स्नान
  • ऋषिकुमारों को राखी बांधकर स्वस्थ एवं समृद्ध जीवन की प्रार्थना

ऋषिकेश। रक्षाबंधन, भारतीय संस्कृति में प्रेम, विश्वास, जिम्मेदारी, कर्तव्य और संरक्षण का उत्सव है। श्रावणी पूर्णिमा के पावन अवसर पर परमार्थ निकेतन में रक्षाबंधन को आध्यात्मिक चेतना, सनातन संस्कारों और पर्यावरण संरक्षण के संकल्प के साथ मनाया।

पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी और पूज्य साध्वी भगवती सरस्वती जी ने अमेरिका में रक्षाबंधन का पावन पर्व मनाते हुए इस पर्व के संदेश को परिवार और रिश्तों से आगे बढ़ाकर समाज, संस्कृति और प्रकृति से जोड़ने का आह्वान किया। इस अवसर पर पौधों को रक्षासूत्र बांधकर प्रकृति की रक्षा का संकल्प लिया गया। यह संदेश दिया गया कि जिस प्रकार राखी की डोर हमें अपने प्रियजनों की रक्षा और उनके प्रति अपने दायित्व का स्मरण कराती है, उसी प्रकार हमें पृथ्वी, जल, वायु, वन और वृक्षों के संरक्षण का भी संकल्प लेना होगा।

पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि रक्षाबंधन प्रेम और संरक्षण की संस्कृति का पर्व है। राखी की छोटी-सी डोर हमें एक बहुत बड़ा संदेश देती है, जिससे प्रेम हो, उसकी रक्षा का दायित्व भी हमारा है। आज आवश्यकता है कि हम इस रक्षा-सूत्र को परिवार की सीमाओं से आगे ले जाकर समाज और प्रकृति से जोड़ें। हमारी नदियाँ, वृक्ष, पर्वत, वन और धरती माता भी हमारी जिम्मेदारी हैं। यदि हम प्रकृति की रक्षा करेंगे, तो प्रकृति आने वाली पीढ़ियों की रक्षा करेगी।

उन्होंने कहा कि आज दुनिया अनेक पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे समय में भारतीय संस्कृति का यह पर्व हमें प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और संरक्षण का संस्कार देता है। एक वृक्ष को रक्षासूत्र बांधना केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि यह स्वयं से किया गया संकल्प है कि हम वृक्षों को बचाए, अधिक से अधिक पौधे लगाएं और प्रकृति के साथ अपने संबंधों को सुदृढ़ करें।

परमार्थ निकेतन में इस पावन अवसर पर ऋषिकुमारों का उपनयन संस्कार विधिवत सम्पन्न हुआ। वैदिक परंपरा के अनुसार उपनयन संस्कार जीवन में ज्ञान, अनुशासन, साधना, सेवा और सदाचार के मार्ग पर आगे बढ़ने का दिव्य संस्कार है। ऋषिकुमारों ने आचार्यों के सान्निध्य में वेदमंत्रों के उच्चारण के साथ विधिवत पूजा-अर्चना की और अपनी जीवन-यात्रा को ज्ञान एवं संस्कारों से प्रकाशित करने का संकल्प लिया।

वेदमंत्रों की पवित्र ध्वनि, यज्ञ की सुगंध और आध्यात्मिक वातावरण ने श्रावणी पूर्णिमा के इस अवसर को और भी दिव्य बना दिया। यह आयोजन एक धार्मिक अनुष्ठान के साथ भारत की प्राचीन ऋषि-परंपरा, ज्ञान-संस्कृति और संस्कारों को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का माध्यम बना।

रक्षाबंधन का पर्व हमें यह संदेश देता है कि रिश्ते केवल अधिकारों से नहीं, बल्कि कर्तव्यों और समर्पण से मजबूत होते हैं। आज आवश्यकता है कि हम अपने परिवारों में प्रेम और संवाद बढ़ाएँ, समाज में करुणा और सहयोग की भावना विकसित करें तथा प्रकृति के प्रति अपने दायित्वों को समझें।

आइए, इस रक्षाबंधन हम एक ऐसी डोर बाँधें जो केवल भाई-बहन को नहीं, बल्कि मनुष्य को मनुष्य से, समाज को सेवा से और मानवता को प्रकृति से जोड़े। प्रेम से रिश्ते सँवारें, करुणा से समाज जोड़ें और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता से जीवन सँवारें।

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